296 : – कार्य का स्वरुप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है। 297 : – अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती। 298 : – कार्य के मध्य में अति विलम्ब और आलस्य उचित नहीं है। 299 : – कार्य-सिद्धि के लिए हस्त-कौशल काContinue Reading

291 : – अर्थ कार्य का आधार है। 291 : – arth kaary ka aadhaar hai. 292 : – धन होने पर अल्प प्रयत्न करने से कार्य पूर्ण हो जाते है। 292 : – dhan hone par alp prayatn karane se kaary poorn ho jaate hai. 293 : – उपायContinue Reading

286 : – निर्बल राजा की आज्ञा की भी अवहेलना कदापि नहीं करनी चाहिए। 286 : – nirbal raaja kee aagya kee bhee avahelana kadaapi nahin karanee chaahie. 287 : – अग्नि में दुर्बलता नहीं होती। 287 : – agni mein durbalata nahin hotee. 288 : – दंड का निर्धारणContinue Reading

281 : – दण्डनीति के प्रभावी न होने से मंत्रीगण भी बेलगाम होकर अप्रभावी हो जाते है। 281 : – dandaneeti ke prabhaavee na hone se mantreegan bhee belagaam hokar aprabhaavee ho jaate hai. 282 : – दंड का भय न होने से लोग अकार्य करने लगते है। 282 :Continue Reading

276 : – कामी पुरुष कोई कार्य नहीं कर सकता। 276 : – kaamee purush koee kaary nahin kar sakata. 277 : – पूर्वाग्रह से ग्रसित दंड देना लोकनिंदा का कारण बनता है। 277 : – poorvaagrah se grasit dand dena lokaninda ka kaaran banata hai. 278 : – धनContinue Reading

271 : – ईर्ष्या करने वाले दो समान व्यक्तियों में विरोध पैदा कर देना चाहिए। 272 : – चतुरंगणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) होने पर भी इन्द्रियों के वश में रहने वाला राजा नष्ट हो जाता है। 273 : – जुए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरेContinue Reading

261 : – बलवान से युद्ध करना हाथियों से पैदल सेना को लड़ाने के समान है। 262 : – कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर टूट जाता है। 263 : – संधि और एकता होने पर भी सतर्क रहे। 264 : – शत्रुओं से अपने राज्य की पूर्ण रक्षा करें।Continue Reading

266 : – दुर्बल के आश्रय से दुःख ही होता है। 267 : – अग्नि के समान तेजस्वी जानकर ही किसी का सहारा लेना चाहिए। 268 : – राजा के प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिए। 269 : – व्यक्ति को उट-पटांग अथवा गवार वेशभूषा धारण नहीं करनी चाहिए। 270 :Continue Reading

256 : – आवाप अर्थात दूसरे राष्ट्र से संबंध नीति का परिपालन मंत्रिमंडल का कार्य है। 257 : – दुर्बल के साथ संधि न करे। 258 : – ठंडा लोहा लोहे से नहीं जुड़ता। 259 : – संधि करने वालो में तेज़ ही संधि का हेतु होता है। 260 :Continue Reading

251 : – निर्बल राजा को तत्काल संधि करनी चाहिए। 252 : – पडोसी राज्यों से सन्धियां तथा पारस्परिक व्यवहार का आदान-प्रदान और संबंध विच्छेद आदि का निर्वाह मंत्रिमंडल करता है। 253 : – राज्य को नीतिशास्त्र के अनुसार चलना चाहिए। 254 : – निकट के राज्य स्वभाव से शत्रुContinue Reading