296 : – कार्य का स्वरुप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है। 297 : – अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती। 298 : – कार्य के मध्य में अति विलम्ब और आलस्य उचित नहीं है। 299 : – कार्य-सिद्धि के लिए हस्त-कौशल काContinue Reading