चाणक्य के अनमोल विचार || Chaanaky Ke Anamol Vichaar – Part 38

186 : - अर्थ, धर्म और कर्म का आधार है।

187 : - शत्रु दण्डनीति के ही योग्य है।

188 : - कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।

189 : - व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।

190 : - शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।

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