चाणक्य के अनमोल विचार || Chaanaky Ke Anamol Vichaar – Part 43

211 : - प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेताविहीन राज्य भी संचालित होता रहता है।

212 : - वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है।

213 : - वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।

214 : - ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।

215 : - आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।

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